छह दिसम्बर १ ९ ९ २ के बाबरी मस्जिद ढहने के बाद इस देश कि राजनीति में राजनीतिज्ञों ने एक शब्द ढूंढ़ निकाला था " धर्मनिरपेक्ष " .
इस देश की राजनीति चुनाव के वक़्त इसी के इर्द गिर्द घुमती रहती है .
कुछ ही दिनों पहले पूरा देश महगाई और भ्रस्टाचार के खिलाफ एकजुट था . ऐसा लग रहा था की अगर इस वक़्त चुनाव हो जाय तो सत्तापक्ष औंधे मुह गिर जाये, पर आज फिर माहौल सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष हो गया है.
क्या है न कि , इस देश की जनता की याददाश्त बहुत ही कमजोर है. इलेक्शन के वक़्त राजनीतिज्ञों द्वारा फेकें गए लोलीपोप के जाल में आसानी से फंस जाते है.
कुछ साल पहले बिहार में नीतीश कुमार ने विकास के नाम पर चुनाव जीता था , विकास हुआ भी ....बिहार को पिछरेपन और अपराध के रास्ते से मुक्त कराकर विकास के रास्ते पर लाने में सफल भी रहे. वहां लोगों के सोचने का नजरिया भी बदला ......जात पात से ऊपर उठकर लोगों ने विकास को तरहीज दी !समय बदला, नीतीश सरकार की सामर्थ बदली तो सोच भी बदली और अब साहब को धर्मनिरपेक्षता का भूत सवार है चाहे इसके लिए कोई भी क़ुर्बानी क्यों न देनी पडे। गढ़बंधन टूटे या रहे ये कोई मुद्दा नहीं है .....मुद्दा है इस देश की राजनीतिक सोच फिर से एक बार धर्म और जाति के मोह्पाश में जकड़ गया है !
मुसलमानों को भरकाया जा रहा है कि, मोदी दंगाई और धार्मिक है तो कुछ लोग मोदी को पिछड़ा कहकर पिछड़ो को लुभा रहे है, कुछ जनाब को विकासपुरुस बता रहे है!
हर एक शब्द के साथ अगले लोकसभा चुनाव का भविष्य जुड़ा है! मोदी, धर्म , राहुल ,गढ़बंधन और नए समीकरणों के बीच महगाई और भ्रस्टाचार जैसे मुद्दे कहाँ गुम हो गए पता नहीं।
इस देश की जनता की उम्मीदों की फेरहिस्त कितनी लम्बी है और कौन कौन उन उम्मीदों की फेरहिस्त में फिट बैठता है ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा पर डर इस बात का है की कहीं फिर से अगला चुनाव का मुद्दा जाति और धर्म के अधर्म में फंसकर न रह जाये ...असली मुद्दे गौण न हो जाये!
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