Friday, 18 December 2009

अरे कोई है....................जो मेरी प्यास बुझाये |




गर्व था मुझे, लालकिले के स्पर्श का  !
फ़ख्र था मुझे ताजमहल के दीदार का !
अब मेरा अस्तित्व खतरे में है,
अब मैं खुद प्यासा हूँ ,
लोगों कि प्यास बुझाते बुझाते !
बरसात में बहता हूँ बरसाती नाले कि तरह |
और गर्मिओं में ,
         सिर्फ मेरी सांसें चलती है, 
         मरणासन्न मरीज कि तरह !
मेरा किनारा ......जले अधजले लाशों से पटा,
और मेरा निर्मल जल हुआ काला
काले काक कि तरह |

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